Saturday, September 25, 2010

From a buddy to a buddy

"अभी परवान चढ़ाना बाकी है..."

यूँ तो चढ़ चुके दोस्ती का पर्वत
पर इसे अभी परवान चढ़ाना बाकी है,
      यूँ तो लिख चुके दोस्ती के ख़त
      पर अभी कलम में स्याही भरना बाकी है,
यूँ तो कितनी ही यादें बाटी हर वक़्त
पर यादों का महल बनाना बाकि है,
      यूँ तो किये कितने ही वादे अब तक
      पर अभी एक भी निभाना बाकी है,
मौके अनेक मिलेंगे परवान चढाने को
सच्ची दोस्ती के पैमाने पैर खरे उतर जाने को,
      अभी तक शायद विफल रहे इस पैमाने पर
      शक अपनो पर, क्योकी था विश्वास जमाने पर,
यूँ तो नीव रखी ताजमहल सी
पर इसे संजो के रखना बाकी है!
     हमारे रस्ते हो जाये शायद अलग थलग
     शायद हम हो दूर, टेढ़ी टूटी हो डगर!
भले हम मिले न मिले, पर नीव को न दरकाना,
चाहे हो कितने ही फासले, ये दोस्ती न भूल जाना!!

सबसे प्यार करो, सब जियो (Don't misinterpret ;))
विमान       

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